सच का पता चल चुका है ।
आज तक जो भी आपको पढ़ाया बताया गया वो सब झूठ है ।
अक्षय कुमार का असली नाम राजीव भाटिया है , इनके पिता एक आर्मी अफसर थे , 1970-80 के दशक में जब देश को फ़ौज में पढ़े-लिखे नौजवानों की ज़रूरत थी , तब ये अपनी कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर पिता के पैसों पर थाईलैंड चले गए थाई बॉक्सिंग नामक मार्शल आर्ट सीखने । भारत में कराटे में ब्लैक बेल्ट लेने व मुआये थाई नामक मार्शल आर्ट सीखने के बाद उसे छोड़ , ये कोलकत्ता में ट्रेवल एजेंसी में बतौर होटल चीफ काम करने चले गए । छोड़ने का सिलसिला यहां नहीं रुका इसके बाद होटल का काम छोड़ , मुम्बई आ गए मार्शल आर्ट सिखाना शुरू किया , फिर उसे छोड़ मॉडलिंग का रास्ता पकड़ा । फिर उसे छोड़ असिस्टेंट फोटोग्राफर का काम पकड़ा , कभी - कभी बतौर बैकग्राउंड डांसर का काम भी किया ।
अंत में सबकुछ छोड़ एक्टर बन गए पहली फ़िल्म 'दीदार' मिल गई ।
1991 - 1999 के दौरान लगभग 45 फिल्मों में काम किया जिनमें अधिकतर या तो औसत या सुपर फ्लॉप रही , जब तब कैरियर की नैया डूबती नज़र आई , 'खिलाड़ी' श्रृंखला की फिल्मों ने इनका कैरियर ज़िंदा रखा । हालांकि इस दौरान मोहरा , इंसाफ , दिल तो पागल है , सपूत , संघर्ष जैसी फिल्में भी आई मगर अधिकतर मल्टीस्टारर ।
2000-2014 के दौरान लगभग 65 फिल्मों में काम किया , जहां इन्हें लगभग अपने हर कॉमेडी रोल के लिए सराहना मिली व इनकी हर कॉमेडी फिल्म ने कामयाबी हासिल की । बीच में ख़ाकी , अंदाज़ , ऐतराज़ , आन , स्पेशल 26 , नमस्ते लंदन , टशन जैसी फिल्में भी आई , मगर इन फिल्मों में भी अलग-अलग दृश्यों में मौका देखते ही आपको अक्षय कुमार के अंदर का राजू आपको दिख जाएगा ।
2015-2022 तिरंगा झंडा युग , इस युग में अक्षय कुमार की तक़रीबन 22 फ़िल्म आ चुकी हैं , इस दौरान अक्षय के अंदर हुए बदलावों को भी आप साफ़ देख पाएंगे । झंडा युग से पहले जो अक्षय अपनी पंजाबी पहचान को हर फ़िल्म में ज़ोर-शोर से चिल्ला चिल्ला कर बताते रहे , अब उन्होंने उस पहचान को छोड़कर एक नई पहचान को उबारा । अब उनका सारा काम एक राष्ट्रवादी-हिन्दू पहचान पर ज़ोर देते हुए, अपने को इस झंडा युग का सबसे राष्ट्रवादी एक्टर साबित करने के इर्द-गिर्द घूमता दिखेगा ।
एक एक्टर जिसकी 2015 से पहले पहचान अधिकतर उसकी कॉमेडी फिल्मों से रही हो , 2011 में हिंदुस्तानी नागरिकता को छोड़कर कनाडा का नागरिक बन चुका हो व उस बात को लोगों से छिपाने की पूरी कोशिश करता हो , जहां जब मन करे अपने आप को राष्ट्रवादी-हिन्दू बताने से पीछे नही हटता ।
हालांकि मेरा मानना ये है कि इस झंडा युग में अक्षय केवल 3 घंटे की फ़िल्म में 3 घंटे सिर्फ तिरंगा झंडा फहराते रहेंगे तो भी उस फ़िल्म को चल ही जाना है , फ़िर भी अपने बतौर एक्टर इन कुछ आख़िरी सालों को यादगार बनाने के लिए वो ऐतिहासिक तथ्यों को अपने अनुसार पेश करने की कोशिश में लगे है , अपने इंटरव्यू में खुलेआम मुग़लो को विलेन व मुग़लो के ज़रिए भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समाज पर दिन प्रतिदिन कोई सनसनीखेज़ दावा कर देते है , जिसका ऐतिहासिक रूप से कोई तथ्य आपको खोजने पर भी नहीं मिलेगा ।
अपने नाम , देश , स्कूल - कॉलेज , व्यवसाय , विचारधारा सबको आज तक छोड़ते छाड़ते अक्षय ऐसा इसलिए कर पाते है क्योंकि वो जानते है जब यहां भारत में मध्यम व निम्न वर्गीय, हिन्दू - मुसलमानों के बच्चें एक दूसरे को मार काट रहे होंगे , तब मैं आराम से अपनी बीवी व 2 बच्चों सहित 4 लोगों की हवाई जहाज़ की टिकट करा कर , अपने देश कनाडा जा सकूंगा ।
- हिमांशु कटारिया
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