शहीद भगत सिंह भारतीय इतिहास का एक ऐसा सितारा जिसे आसमान से ज़मीन पर लाने में हमने कोई कमी नहीं छोड़ी है । बेहद विलक्षण प्रतिभा के धनी भगत सिंह को बिना जाने , जानने का जो ढोंग हम इतने सालों से करते रहे है उसका परिणाम ये हुआ कि हम भगत सिंह से इतनी दूर चले गए है कि हमें बस भगत सिंह बंदूकों , टी शर्टस , प्रोफ़ाइल पिक्चरों और बस नारों में दिखाई या सुनाई देते है । भगत सिंह मात्र 23 वर्ष की उम्र में देश की आज़ादी के लिए इस दुनिया को अलविदा कहने वाले नौजवान , जिस उम्र में शायद आज इस आज़ाद भारत का युवा इधर उधर सिर्फ विराट - रोहित , सलमान - शाहरुख , मोदी - राहुल की खींच तान में व्यस्त होता है , उस उम्र में अपना जीवन देश के लिए त्यागने से पहले अपने विचारो का एक विशाल भंडार भगत सिंह ने हमारे लिए छोड़ा है । भगत सिंह की छवि को सिर्फ एक ऐसे क्रांतिकारी के रूप में याद रखना जो आज़ादी पाने के लिए हिंसा का सहारा लेने से भी पीछे नहीं हटता उनके विचारों और उनकी शख्सियत के साथ गद्दारी है । कई मित्र उनकी फोटो लगा कर या उनकी एक लाइन में लिखा कोई विचार दूसरों के साथ साझा कर अपने आप को भगत सिंह का परम भक्त मानते है , परन्तु हम सब में से कितने जानते है कि जब हम अपने विद्यालय की 11 वीं कक्षा में शायद ये सोच रहे होते है कि इस साल पास कैसे हो , भगत सिंह ने 17 वर्ष की आयु में अपना पहला पुरस्कृत लेख लिखा जिसके लिए उन्हें ईनाम भी दिया गया जिसका विषय ' पंजाब में भाषाई परेशानियां ' था । बलवंत सिंह नाम से उन्होंने ' विश्वप्रेम ' व ' युवक ' नाम से मतवाला पत्रिका में लेख लिखे । कम्युनिज्म व सोशलिज्म पर कार्ल मार्क्स व व्लादिमीर लेनिन के विचारो से प्रभावित होकर उन्होंने अपने लेखों की श्रृंखला उस समय की पत्रिका ' कीर्ति ' में छपवाई । जेल जाने के बाद भगत सिंह ने सिलसिलेवार रूप से विभिन्न मुद्दों पर अपने विचारो को दुनिया के सामने रखा जिनमें से कुछ पत्रिकाओं व अखबारों में छपे व कुछ विभिन्न कारणों से नष्ट हो गए । उनके लेखों में से प्रमुख The Idea of Socialism , Autobiography , At The Door of Death , History of Revolutionary Movement in India , Jail Notebook प्रमुख है । उनके द्वारा लिखा गया लेख ' मैं नास्तिक क्यों हूं ' दुनियाभर में बहुत प्रचलित हुआ व सराहा गया । जानकारी के मुताबिक , भगत सिंह ने अपने पूरे जीवन काल में एक बार गोली चलाई जिसमें सांडर्स को मारने के लिए उन्होनें हथियार का इस्तेमाल किया , उसके अलावा पार्लियामेंट में बम फेकते वक्त भी उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि हमारे द्वारा फेके हुए बम ऐसी जगह फेके जाए जहां वो किसी को नुक़सान न पहुंचाएं । गौरतलब है भगत सिंह ने अपने पूरे जीवन काल में अपने विचारो के द्वारा कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया , अपने 23 साल के जीवन में एक बार उन्होंने बंदूक का सहारा लिया , परन्तु उन्होंने अपने जीवन में सैकड़ों लेखो द्वारा अपने विचारो को दूसरों तक पहुंचाया , परन्तु दुर्भाग्य की बात है भगत सिंह को बस हमने बंदूकों , पोस्टर , फेसबुक पोस्ट व नारों तक सीमित कर दिया है ।
- हिमांशु

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें