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.........अब्बू तुम्हें मारेंगे नही

क्या किसी इस्लाम, हिंदुत्व, ईसाईयत या किसी भी धर्म या मज़हब में किसी और धर्म या मज़हब के इंसान से नाता जोड़ना या विवाह करना किसी दूसरे इंसान को मार देने से भी ज़्यादा बड़ा गुनाह है?
क्या हमारा ऊपरवाला हमारा हिसाब करते वक़्त हमारा किसी दूसरे धर्म के इंसान से विवाह के बंधन में बंधने को ज़्यादा बड़ा या ना माफ़ किये जाने वाला गुनाह मानेगा, किसी को जान से मार देने से भी बड़ा!
जब भी मैं अंकित सक्सेना और उसकी प्रेमिका सलीमा की उस आख़िरी मुलाक़ात या फ़ोन द्वारा की गई उन  आख़िरी पलों की आख़िरी बातों के बारें में सोचता हूँ। मैं उस लम्हें में ख़ुद को खड़ा पाता हूँ जहाँ शायद वो दोनों एक दूसरे के साथ लोगों से छुप-छिपकर बिताए गए उन खुशियों से भरें लम्हों के बारें में सोच रहे होंगे जहाँ उन्होंने एक साथ रहने की कसमें खाई होंगी।
लड़के का ये कहते हुए लड़की को भरोसा दिलाना की मैं सबको मना लूंगा।
और लड़की का लड़के से कहना की मेरे अब्बू-भाई कुछ नही कहेंगे मैं उन्हें जानती हूँ।
और ऐसी कई अनगिनत बातें, खुशियाँ, आँसू, डर और इन सबके बीच कही पनपता हुआ प्यार।
उस दिन भी शायद सलीमा ने अंकित को भरोसा दिलाया होगा की तुम मेरे पास आ जाओ हम दोनों मिल कर सबकों मना लेंगे। और फिर वही बात दोहराई होगी मैं अपने अब्बू को जानती हूँ वो तुम्हें मारेंगे नही।
सलीमा के घरवालों ने मिलकर अंकित को गला रेत कर मार दिया ठीक उसी वक़्त जब उसकी सलीमा उसका इंतज़ार टैगोर गार्डन मेट्रो स्टेशन पर कर रही थी।
अंकित के आख़िरी बार अपनी सलीमा तक पहुँचने से पहले ही बीच रास्तें में पकड़कर लड़की के परजिनों ने लड़के को मार दिया और ख़ुद को एक गुनाह से बचाने के लिए एक उससे भी बड़े गुनाह को अंजाम दिया। शायद उन दोनों प्रेमियों ने ही प्यार करने से पहले उसके इस अंजाम के बारें में नही सोचा होगा।
क्या हमारा मज़हब हमें इंसान होने के उस आधार से इतनी दूर ले आया है की हम सिर्फ़ हिन्दू मुसलमान ईसाई सिख बनकर रह गए है।
क्या धर्म की रक्षा करना सच में किसी इंसान की जान से भी ज़्यादा ज़रूरी है। और क्या सच में धर्म का आधार प्रेम से पहले नफ़रत है?
ये सवाल है उन लोगों से जो सलीमा के घरवालों की तरह सोच रखते है की क्या हमारा ऊपरवाला इतना नफ़रत पसन्द है की वो हमें दो प्यार करने वालों को मिलने देने पर कभी माफ़ नही करेगा मगर किसी दूसरे इंसान की जान लेने पर शायद कर देगा?
उन लोगो से भी एक सवाल जो अंकित की मौत के प्रति संवेदना दिखा कर इस घटनाक्रम को राजनीतिक रंग रूप देने की कोशिश कर रहे है की वो क्या करते अगर वो सलीमा या अंकित के माँ-बाप होते?
क्या वो अपनी सब आपत्तियों के बावजूद अपने बेटे या बेटी के फैसलों को मानते या फिर वो भी इस तरह की कोई हैवानियत दिखाते।
ऐसे कई सवाल इस एक मामले ने हमारे सामने आज खड़े किए है।
मगर इन सब आवाज़ों के बीच , इन सब शोर-शराबों के बीच मेरा सलीमा-अंकित के उन कुछ खुशियों के पलों के बारे में सोचना और उस आख़िरी मुलाक़ात में एक दूसरे के आँसू पोछते हुये उन आख़िरी लम्हों के बारे में सोचना मुझे अंदर तक झकझोर जाता है।
उदास कर जाता है।

- हिमांशु कटारिया

टिप्पणियाँ

  1. mai religion ko sirf logo ki apne aap ke liye security smjhta hu....hmara sabse bada religion insaniyat hona chahiye.....jab kisi insan k paas insaniyat hi nhi hogi to religion ka kya karoge janab.....religion ke piche itne pagal mat karo logo ko........ kuch karna hai to insaniyat ke liye kuch achha karo
    -Vishal Salodia

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  2. सही कहा।
    धर्म ज़िन्दगी को जीने का तरीका हो सकता है।
    हर धर्म अपनी अच्छाइयों व बुराइयों के साथ ज़िंदगी को जीने का तरीका बताता है।
    मगर धर्म ज़िन्दगी नही हो सकता उससे बढ़कर नही हो सकता।

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