"बिड़ला भवन में शाम पाँच बजे प्रार्थना होती थी लेकिन गान्धीजी सरदार पटेल के साथ मीटिंग में व्यस्त थे। तभी सवा पाँच बजे उन्हें याद आया की प्रार्थना के लिए देर हो रही है। 30 जनवरी 1948 की शाम जब बापू आभा और मनु के कन्धों पर हाथ रखकर मंच की तरफ बढ़े कि उनके सामने नाथूराम गोडसे आ गया। उसने हाथ जोड़कर कहा - "नमस्ते बापू!" गान्धी के साथ चल रही मनु ने कहा - "भैया! सामने से हट जाओ, बापू को जाने दो। बापू को पहले ही देर हो चुकी है।" लेकिन गोडसे ने मनु को धक्का दे दिया और अपने हाथों में छुपा रखी छोटी बैरेटा पिस्टल से गान्धी के सीने पर तीन गोलियाँ दाग दीं। 78 साल के महात्मा गान्धी की हत्या हो चुकी थी। बिड़ला हाउस में गान्धी के शरीर को ढँककर रखा गया था। लेकिन जब उनके सबसे छोटे बेटे देवदास गान्धी वहाँ पहुँचे तो उन्होंने बापू के शरीर से कपड़ा हटा दिया ताकि दुनिया शान्ति और अहिंसा के पुजारी के साथ हुई हिंसा को देख सके।"
एक ऐसा वाकया जिसने शायद हमेशा के लिए भारत देश के जनमानस में द्वेष का वो बीज बो दिया जो आज तक हमें व एक दूसरे के प्रति हमारी मानवीय सवेंदना को लगातार ह्यास की ओर ले जा रहा है। हम आज भी अक़्सर लोगों को इस बहस में पड़ते देखते है कि "गांधी हत्या" थी या "गांधी वध"।
अपने अपने पक्ष को सही ठहराने के लिए तरह तरह के आरोप लगाए जाते है और अपने पक्ष को सही ठहराने के लिए वाद-विवाद होता रहता है।
पिछलें कुछ सालों में गांधी हत्या को सही ठहराने ओर उसके पीछे की वजहों को सही ठहराने की मुहिम तेज़ हुई है। जनता को बस वही बताया जाता है जितना बताना चाहतें है या जितना आपकी राजनीति के लिए फ़ायदेमंद है । आज की इस तेज़ी से चलती ज़िन्दगी में लोगों के पास किसी बात की तह तक जाने या उससे जुड़ी सच्ची झूठी जानकारियों तक जाने का भी पर्याप्त वक़्त नही है। लोग वही सच मानते है जो नेता उन्हें बताते है, जो न्यूज़ एंकर उन्हें बताता या दिखाता है, जो उनके मित्र उनसे व्हाट्सएप्प मैसेज या फेसबुक पोस्ट में उनसे साझा करते है । नेता, एंकर और पोस्ट ने हमारे समक्ष एक ऐसे गांधी को रखा है जो मुस्लिम परस्त , हिंदुस्तान - पाकिस्तान बंटवारे का दोषी ओर भगत सिंह की फांसी ना रुकवाने वाला एक खुदगर्ज़ और महत्वकांशी नेता था।
मगर वही नेता,एंकर और पोस्ट हमें उसी गांधी के उस सही स्वरूप से कभी अवगत नही कराते जो विदेश में रह कर अपने ईसाई , यहूदी व अन्य सभी धर्मों के अपने मित्रों से विनम्रता पूर्वक शुरुआत से लेकर अंत तक हिन्दू धर्म की सादगी अहिंसा और विराटता पर अंत तक लड़ता है, यही नही कई विदेशी मित्रों से तो गांधी अपने अंत समय तक हिन्दू धर्म सबसे बेहतर धर्म क्यों है , के पक्ष में पत्र व्यवहार करते रहे। क्योंकि शायद अगर जनमानस असली गांधी व उसके विचारों को जान गया तो उनकी खोखली हिन्दुतत्व की वो दुकान जिसपे वो अपनी राजनीति की रोटियां सेंकते है बन्द हों जाए ।
1857 के संग्राम के बाद कि ब्रिटिश हुक़ूमत के विरुद्ध जनभावना को एक एकसार करना व छोटे बड़े विद्रोहियों को भारतीयता की एक भावना में बांधना गांधी ने ही मुमकिन किया।
भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव की फांसी रुकवाने की बात उन्होंने वाइसराय लार्ड इर्विन से भी अपनी बात चीत में कही , पर क्या भगत सिंह जिन्होंने अपने पिता किशन सिंह से अंग्रेजी हुक़ूमत के आगे उनकी फांसी माफ करने की गुहार न लगाने की बात कही , क्या वो भगत सिंह सच में चाहते की गांधी या कोई भी और अंग्रेजी हुक़ूमत के आगे उनकी फांसी माफ करने को लेकर सिफ़ारिश करे?
गांधी जैसे महान विचार को समझने के लिए हमे व्हाट्सएप्प मैसेज से अलग गांधी को पढ़ने की ज़रूरत है। थोड़ा ही पढेंगे तो बहुत जानेंगे गांधी को।
आज 30 जनवरी का ये दिन इन हालातों में जब रोज़ हर दिन गांधी को गोडसे कही न कही मार रहा है , मुझे खुद को गांधी के बारे में लिखने से रोक नही पाया। शायद मेरी इन बातों से अब भी कुछ मित्रों को फ़र्क न पड़े उनकी सोच शायद उसी गांधी से ज़्यादा परिचित हो जो उन्हें दिखाया गया है। मगर बस गुज़ारिश ये करूँगा की आप उनकी आलोचना करने से पहले उन्हें जानने उन्हें समझने की ज़हमत तो उठाइये। थोड़ा वक्त निकालिये मगर पढिये ज़रूर ।
-हिमांशु कटारिया
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